पिथौरागढ़। उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पारंपरिक गायन विधा ‘जागर’ को नई पहचान दिलाने वाली पहली महिला जागर गायिका पद्मश्री बसंती बिष्ट के जीवन और संघर्षों को अब युवा पीढ़ी शोध के माध्यम से सहेजने में जुट गई है। इसी क्रम में युवा कलाकार एवं शोधार्थी पीयूष धामी ने बसंती बिष्ट के जीवन पर आधारित एक विस्तृत लघु शोध तैयार कर उन्हें भेंट किया।

पीयूष धामी द्वारा तैयार किए गए इस शोध में बसंती बिष्ट के बचपन से लेकर जागर गायन के क्षेत्र में कदम रखने तक की चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। साथ ही, जागर विधा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के उनके संघर्षपूर्ण सफर को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। शोध में उनके सामाजिक संघर्ष, पारिवारिक जिम्मेदारियों और लोक संस्कृति के संरक्षण में निभाई गई भूमिका को भी रेखांकित किया गया है।
पीयूष ने बताया कि इस शोध का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं को दस्तावेजी स्वरूप में संरक्षित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी प्रमाणिक जानकारी मिल सके। उनका कहना है कि लोक कलाकारों के जीवन पर गंभीर अध्ययन समय की आवश्यकता है।
इस अवसर पर पद्मश्री बसंती बिष्ट ने युवा शोधार्थी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जब युवा अपनी जड़ों और लोक कलाओं पर कार्य करते हैं, तभी संस्कृति जीवंत बनी रहती है। उन्होंने पीयूष को आशीर्वाद देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
पीयूष धामी ने इस उपलब्धि का श्रेय राष्ट्रीय बाल साहित्यकार इंजीनियर ललित शौर्य, अपने माता-पिता और गुरुजनों को दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे शोध कार्यों से लोक कलाकारों को सम्मान मिलता है और भावी शोधार्थियों के लिए संदर्भ सामग्री भी उपलब्ध होती है।
इस पहल पर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और संस्कृति प्रेमियों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए पीयूष को बधाई दी है।
